Thursday, November 30, 2006
यादों के पल
कैसे भूला पायेंगे हम वो बीती यादों के पल
किस तरह मोहब्बत ने हमको जीना सिखाया है
एक ही पतझड़ में घबराकर मुंह मोड़ लिया
अभी तो कितने बहारों के मौसम भी बकाया है
कल हजारों शामिल थे खुशी की महफिल में
आज गम का साथी सिर्फ हमारा साया है
खुशियों से भरना चाहते थे किसी का दामन
उमर भर का गम बदले में इनाम पाया है
लोग किस तरह से लुट जाते हैं मोहब्बत में
ये राज़ तो अब हमारी समझ में आया है
इस दिल के जख्मों की दवा की तलाश में
"विजय" ने आज फिर नया जख्म खाया है
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