Wednesday, November 28, 2007

तुम्हारा साथ


ऐ मेरे दिल चल कहीं और तलाश कर अपने बसेरे की
उनकी ज़िंदगी में तो अब कोई जाने पहचाने आ गए

उनके साथ चले थे कुछ कदम उनका दिल बहलाने को
एक और जख्म खाकर वापिस अपने ठिकाने आ गए

बुझती शमा को रोशन किया हमने अपने आप को जलाकर
आज चमकती हुई रौशनी देखकर कितने परवाने आ गए

हम तो हमसफ़र थे सिर्फ उन तनहा और वीरान रातों के
आज कितने ही सूरज उनकी महफिल को सजाने आ गए

कल तक तो वो खवाब ही नहीं देखा करते थे कभी
आज तो सपने उन्हें ज़िंदगी का रास्ता दिखाने आ गए

हमने तो उनके होठों को शायद मुस्कुराना सिखाया था
देखिये आज वो मेरे हालात पर कहकहे लगाने आ गए

वो तो कहते हैं कि हर बात को दिल पर नहीं लिया करते
कितने समझदार लोग आज 'विजय' को समझाने आ गए

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