Wednesday, February 13, 2008

शहीदों का पैगाम


शहीदों ने अपने लहू से लिखे थे वो पन्ने इतिहास के
तब कहीं जाके हमने आज़ादी का हसीं मुकाम पाया

उनकी दीवानगी की भी हद थी वतन की मोहब्बत में
फांसी के तख्ते पर जिन्होंने तराना-ऐ-इंकलाब गाया

धरती माँ के आंचल पर जब भी पड़ी कोई बुरी नज़र
सरहद पर जांबाज़ जवानों के खून का सैलाब आया

आँख उठा कर न देखने पाये कोई हिन्दुस्तान की तरफ़
'विजय' आज देश के नाम शहीदों का ये पैगाम लाया

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