Wednesday, October 29, 2008
तेरी शोहरत
गुप्तगू महज़ तेरी वफ़ा पर ही मुख्तसर नहीं हुई
वो शोखियाँ भी तो अब नहीं रही तेरे जमाल में
सुना है शहर में हर तरफ़ चर्चे है तेरी शोहरत के
जब कोई परवाना झुलस गया था तेरे जलाल में
पल भर में कैसे बिखर जाती वो बरसों की चाहत
एक ज़माना लग जाता है हसरतों के इंतकाल में
सच्ची मोहब्बत के आगे झुक जाती है ये कायनात
न जाने कितने बरबाद हो गए इसी मायाजाल में
मेरी ज़िन्दगी में आते तो कुछ और ही बात होती
किसी की उमर अब नहीं गुजरेगी इस मलाल में
देर से ही सही पर सारा वहम तो निकल गया
अब कौन अपना सुकून ढूंढ़ता है तेरे विसाल में
तुझ पर कोई इल्जाम ना लगाए मेरी बर्बादी का
परवरिश का असर नजर आता है मेरे ख्याल में
ये हुस्न का गुरुर तुमसे और क्या नहीं करवाएगा
तेरे तमाम जवाब शामिल हैं 'विजय' के सवाल में
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