Tuesday, July 11, 2006
क्या तुम वही हो ...
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
ख्वाबों के आसमान पर, हकीकत की धरातल से दूर
रात के अंधेरों मे, दिन के सफ़ेद उजालों से दूर
दिल की गहराइयों मे, मगर दिमाग की सोच से दूर
तमन्ना की तरह पले, पर अभी तक सचाई से दूर
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
रंगीन सपनो में तुम, लेकिन असल ज़िंदगी से दूर
बारिश की बूंदों में तुम, वक्त की धुप से दूर
मेरी हर कल्पना में तुम, पर मेरे विचारों से दूर
जिस पे जान देने का दिल करे, मौत की परवाह से दूर
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
मेरे जीवन की सांस मे बसी, वक्त की हवाओं से दूर
ज़िंदगी जिसके नाम कर दें, पर मेरी वफाओं से दूर
महक सकता था गुलिस्तानन, लेकिन वो इन फिजाओं से दूर
एक ख्वाब देखा था अभी, शायद उनकी तमन्ना से दूर
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
ये वक्त और क्या दिखायेगा, हम आज उनकी ज़िंदगी से दूर
उनकी नीयत हम पहचान गए, वह है बस बंदगी से दूर
आ गया है ज़िंदगी का एक सबक, झूठ हमेशा है सच से दूर
'विजय' ने ज़िंदगी गुजारी है, इस मतलबी दुनिया से दूर
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment