Tuesday, July 11, 2006
क्या तुम वही हो ...
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
वो सहमी सी आरजू, अपनी किस्मत पर रोती होगी
वरना क्या ज़िंदगी इस कदर भी बदनसीब होती है
ज़िंदगी इतनी बेरंग भी नहीं होती कि मुस्कान ना हो
किसी को अपना कर देखो खुशी कितने करीब होती है
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
इन आँखों की नमी एक खुशी में बदल जायेगी
एक बार ही सही, किसी को आजमा कर तो देखो
ये माना की ज़िंदगी ने बहुत कुछ सिखाया है
दिल पर जो चोट खाई है उसे भूला कर तो देखो
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
ये ख्वाब हकीकत में बदल जायेंगे कभी
सही रास्तों पे चलने पर कभी मंजिल भी मिलेगी
हर ज़िंदगी किसी 'आरजू' की तलाश मे रहती है
अगर कुछ पाने का इरादा है तो हर खुशी मिलेगी
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
कल्पना की दुनिया में कोई सच्चाई नही होती
हकीक़त ही हर वक्त 'आरजू' की तलाश करती है
ज़िंदगी को इस सफर में हमसफ़र की तलाश है
कोई आरजू है जो किसी की मोहब्बत पे मरती है
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
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1 comment:
i really loved all these verses of 'kya tum wahi ho..'
felt really nice to see them here on your blog.. its a nice complilation.. n also a continuity is maintained here..which makes it much more worthwhile to read..
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