Tuesday, July 11, 2006
क्या तुम वही हो ...
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
एक और नई सुबह के साथ एक और नई उम्मीद
सूरज की पहली किरण जगा गई दिल मे आस
गम की काली रात शायद बीत गई है अब तो
एक नई ज़िंदगी बुला रही है हमको अपने पास
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
समझ गए हें अब ज़िंदगी की इस सच्चाई को
कि कोई रास्ता कभी भी मंजिल नहीं हो सकता
जो लोग साथ छोड़ कर चले जाते हें बुरे वक्त में
वो कुछ भी हो लेकिन सच्चा प्यार नही हो सकता
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
बीते हुए लम्हे कौन भूला सकता है कभी
उन्ही लम्हों ने तो ज़िंदगी जीना सिखाया है
सभी रंग देख लिए हें हमने इस ज़िंदगी के
हर हाल मे अपने गम को पीना सिखाया है
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
वह और थे जो हिम्मत हार कर बैठ गए
हर सुबह ज़िंदगी मे एक नई शुरुआत लाती है
आज फिर एक नई उमीद से ज़िंदगी मुस्कुराई है
देखें 'विजय' की किस्मत क्या गुल खिलाती है
जिसे ढूँढती हें निगाहें, क्या तुम वही हो...
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